Shame on Indian Intelligence/Government: fourteen times death of Netaji Subash

Shame on Indian Intelligence/Government: fourteen times death of Netaji Subash

Post No. “EX12-B03”
Album : “EX-12: “नेताजी की मौतें !” “DEATHS OF NETAJI !” “নেতাজীর বারম্বার মৃত্যু !”
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“क्यों हो गए नेताजी हमारे नजरों से बाहर ?!” / Why Netaji is away from our sight ?! / ‘কেন হলেন নেতাজি আমাদের দৃষ্টির অন্তরালে ?!’
[In Mixed Hindi & English, -In both Hindi and English completely in this post. हिन्दी और अंग्रेजी -दोनों में ही इस पोस्ट में विवरण अंश में लेख को दिया गया है ।]

Ӂ•(53) 〜विसुयल में सुभाषजी की चौदह दफा मौतें हो चुकी है, यह बात बताई गयी है । और साथ में यह भी बताई गयी है की इन सब मौतों को छोड़ कर और भी कई मौतें हुई होगी, -जिसकी कोई ब्यौरा मेरे पास अभी तक पहुंची नहीं है । … १८ अगस्त १९४५ को हवाई हादसे में सुभाषजी की सरकारी तथा प्राधिकृत मौत हो जाने बाबजूद, आगे की और आठ मौतों में से, हरेक मौत ही —या तो सभी के सभी सत्य है, या सभी के सभी मिथ्या है । —क्योंकि किसी के पास ही सत्य या मिथ्या की कोई सबुत नहीं है । ऐसी स्थिति में सभी को झूट मानने से तो बढ़िया है की सभी को ही सत्य बोल कर मान लिए जाएँ: —जिससे की रहस्य को रहस्य के रूप में ही स्वीकारते हुए उसे रहस्यमुक्त की जा सकें; —सट्टाबाजी से नहीं, और न ही तर्कसंगत अभिमत की आड़ में अंधाधुंध बेतर्तीब तर्कबाजी से।
[~ It is stated and enlisted in the visual that Subhasji had faced fourteen deaths so far. And is also stated that, apart from all of these deaths, some more cases of his deaths are there, – the details of which have yet not been reached to me. … After the mostly-known government-sponsored and officially-authoritative death of 18th August of 1945 by air crash, among the eight more deaths, -either all are true or all are false. Because there are no concrete and clinching evidences regarding any statement as to weather that is either true or is false. Because of the fact that truthfulness or falsehood has no proof, in this case, acceptance of those statements as truth is far more better than to acceptance those as all false; —so as to take-up the mystery as the mystery —further to demystify it; —not through fooling others, and not also through the random blind debate-declamation’s under the disguise of rationalism ]

Ӂ•(54)… अत: बात फिर यही बन जाती है की “रक्खे हरि तो मारे कौन, और मारे हरि तो रक्खे कौन !?” मन ही मन में सुभाष की मौत चाहने या सोचने वाले भी एकदिन चल बसेगा, जबकि सुभाष की आखेरी ख्वाईस पूरी न होने से, सुभाष को तब तक ही ज़िंदा रहने पड़ेगा !! क्योंकि अध्यात्म-अधिविद्या के मुताबिक ‘जबतक प्राणी अपनी मोह से मुक्त नहीं हो पाता है तबतक काया-पिंजर से प्राण-पखेरू भी मुक्त नहीं हो पाता है”। सुभाष की एकमात्र ख्वाईश -“बगैर गुलामों के मुल्कों वाली दुनिया” तो अभी भी पूरी नहीं हुई !
—पर आगे भी क्या कभी सुभाष का सपना पूरा होगा ??? …मुझे तो लगता है की ऐसा कुछ कभी भी होने वाला नहीं है । -क्योंकि सुभाष तो क्या सुभाष से पहले भी ऐसा उट-उटांग सपना देखने वाले कई आये और गए । पर. हम दुनिया वाले तो ज्यों का त्यों ही रह गये है ।
[So then it becomes a matter of consideration of the proverb that “Who may be killed if the almighty keep one alive, and who may remain alive if the almighty let one be killed ?!” All those will pass away one day who deserves or desires or think of Subhas’s death, -though Subhas may have to be remained alive till his aspirations are fulfilled. Because as per the thesis of divine-metaphysics ‘no creature can ever be free from the bondage of life, unless and until he is free from his delusions’. “The only delusion of Subhas is towards the slaves of his own country particularly and extensively towards that of the whole of the world. And, his dream of “the world of countries without slaves” is still not materialized!
– But will ever that dream of Subhas be fulfilled? I think … something like that is never going to happen. — Because not only that for Subhas, —but all the such predecessors of Subhas with such peculiar dreams did come and passed away, -whereas we are so far left enacted with their dreams!!!]

Ӂ•(55) (क) इस विश्व-चराचर में कोई भी तत्व, जिसकी सृष्टि हुई है, उसका नाश भी अवश्य ही एकदिन होना है !
[(A) Any entity in this universe, which is created once, -is bound to be destroyed once!]

(ख) जिसकी शुरुवात हुयी है उसकी समाप्ति भी अवसंभाबी है !
[(B) Anything which has been started once, -is bounded to be finished once!]

(ग) इस नश्वर धराधाम में कोई भी तत्व अविनश्वर नहीं हो सकती है।
[(C) Nothing can be immortal or everlasting in this universe]

(घ) कोई भी प्राणी चिरन्जीवी नहीं हो सकता। जैसा वह एक दिन इस धरती में आ चुका है, वैसा ही उसे किसी एकदिन अलविदा भी लेनी पेड़ेगी।
[(D) No creature can be ever living. As it has come into existence one day in this earth, so is to go away one day from here to somewhere else.]

(ङ) ‘सृष्टि-स्थिति-विनाश’ चक्र का ये एक अमोघ नियम है। इस नियम का कहीं भी, कभी भी, किसी के द्वारा भी, किसी के लिए भी और किसी भी स्थिति में कोई व्यतिक्रम न तो हुआ है,, -और न ही हो सकता है !!! …इस विश्वचराचर में कोई भी तत्व ही स्थिर व स्थायी नहीं है; —कुछ भी अविनाशी-अविनश्वर नहीं है । सबकुछ ही परिवर्तनशील तथा नियत-समरूपी-गतिशीलावस्था में है, —चाहे वह जैविक-तत्व हों या हों जड़-तत्व ।
[(E) These are the unalterable laws of Generation-Operation-Destruction circle. There can’t be any exception to these laws of nature by anybody, for anybody, at anywhere, in any time, at any situation. ….Nothing is static or permanent in this universe, -nothing is non-destructible. Everything is dynamic, -is in some uniform motion and every entity whether living or non-living is bound to be in some constant changes of status.
No creature can ever be immortal, -everyone is mortal.]

(च) अत:, चाहे कोई कुछ भी कहता रहे, २३ जनवरी सन १८९७ को जन्मे उस नेताजी की भी मौत होना ही है। अवश्य ही होन है। हमारे नेताजी सुभाषचन्द्र वसु के लिए भी ये नियम लागू है। नेताजी चाहे उस अंग्रेजी हुकूमत कि कोई भी नियम मानने को तैयार नहीं हो, पर विधाता का इस विधान को वह कैसे तोड़ सकता है ??? इस नियम को उसे मानने ही पडेगा !!!
[(F) And thus, whatever may be said by whosoever, the Subhas who born on the 23rd January of 1897, must have to die on some day. All the above mentioned eternal laws are equally applicable to our Netaji also. May that Netaji be not ready to abide by or obey the laws of the British-Indian Government, —but how can he be able to disobey the laws of the almighty??? He is must to abide by these laws!!!]

(छ) हमारे बाप-दादाओं कि मौतें हो चुकी है; -या तो फिर होनी है। —तो फिर नेताजी को भी मरने पडेगा !
~ ~ ~ हाँ, उसे मरने ही पडेगा ! ….लेकिन कब ? —कहाँ ? —कैसे ? —किसके हातों में उसे मरने पडेगा ? —कौन जिम्बेबार रहेगे उसकी मौत के पीछे ???
[(G) Our forefathers are died: -or are to be died. —and thus Netaji is to be died also!
~ ~ ~ Yes, he is to be died! …but when? —where? —how? —in whose hands? —Who will be responsible for his death ???]

Ӂ•(56) ऊपर दिए गए बयान बिना किसी विरोधी तर्क को स्वीकारते हुए, सभी संबंध में सत्य है ।
और जैसा की सुभाष 23 जनवरी 1897 को जन्मे थे, वैसा ही उसे ज़रूर एकदिन मरने बी पड़ेगा । —लेकिन कब और कहा उसे मरने पडेगा ये सब बातें अभी तक निश्चित नहीं हो पाये है। …जीवन-काल जीवों की सभी प्रजातियों के लिए एक जैसा सामान नहीं होता है। साथ ही साथ, किसी विशेष प्रजाति के हर सदस्य के लिए भी एक जैसा नहीं हो सकता।
बकवास चाहे कोई भी कितने करता रहे, पर आज तक इस दुनिया में ऐसा कोई भी शक्स नहीं निकला, जो की किसी के जनाम या मौत के सही क्षण-दिनांक-स्थान तथा मौत के ज़िम्बेबार हेतु …आदि की पूर्वाभाष कर सकें । अगर कोई ऐसा करें, तो उस से बढ़ कर घोर झुटेरे-मक्कार ज़माने के कोई दुसरा नहीं हो सकता ।

—क्योंकि, भविष्य कभी भी किसी तरीके से ही पुर्वभाषित नहीं हो सकता है । ऐसा तो उस उपरवाला भी किसी के भविष्य निर्चारित नहीं करतें है । क्योंकि भविष्य की उत्पत्ति हमेशा ही वर्त्तमान के गर्भ में से होती रहती है, -जैसा की वर्त्तमान भी अतीत के गर्भ में से निकलता तहता है । भविष्य सतत-विवर्तन-शील एक अनिश्चित तत्व है और इस कारण वर्त्तमान जैसा इसकी कोई निर्धारित स्थिति नहीं होती । हर पल की हर धरकन के साथ वर्त्तमान जैसा अतीत में बदलता रहता है, -वैसा ही भविष्य भी अपनी संभावनाओं की दिशाए झटके भर में बदलता रहता है ।
और इस सन्दर्भ में, आखेरी बात जो की हमेशा के लिए याद रखना है वह है, ‘हर भविष्य के भी अपना किसी एक भविष्य होता है, —और वह है केवल अतीत की ही पुनरावृत्ति, —किसी नया रूप में । … … —और इस चक्र हमेशा ही घुमाता चल रहा है ।
मेरे नेताजी भी जीता जागता चल रहा है ! खासियत सिर्फ इतना है की सुभाषजी जीता-जागता चल रहा है अपनी ही काया में, —अप्पन के वही सपनों को साथ ले कर । न जाने कब उनकी उस उम्मीद पूरी होगी की, —‘बगैर गुलामों के मुल्कों वाली दुनिया’!!
[Each one of the above statement is truth in all respect, without any single acceptable anti-argument.
And, as Subhas was born on some day, i.e., on 23 Jan 1897, so he is also bound to die. —But when to die and where to die those are not been confirmed still. …Life span is never common for all the species of organisms. At the same time, even for a specific type of specie, the life-span is not to be the same.
Nobody can ever predict the death day, place of death, and the reason of death as well as the factors responsible for the death of anybody. If anybody does the same, then he is certainly the worst liar of this world!

—Because the future can’t ever be predicted in any way. Even the almighty is not supposed to fix the future of any entity. The future is always evolved through the present, -as the present is the production of the past. The future is ever changing and has its no actual existence as present. With the stroke of each moment the present is constantly converting to its past; -and similarly the future does also changes its probabilities constantly and suddenly with the passage of each moment.
And, in this respect, finally this is to be kept always in mind that, ‘each future has its own future, —and that is the reinsertion of the past in some changed form only. … And the cycle rolls on’.
My Netaji also lives on! And the specialty is just this, that, ‘Netaji lives on within his same physical structure and unchanged dreams!!!]

Ӂ•(57) अभी हम अगले पोस्टों में कुछ विस्तारित ढंग से उन चौदह मौतों के बारे में चर्चा करेंगे । और साथ ही साथ अगली सोलाहवीं मौत के बारे में भी अति स्पष्ट रूप से बता देंगे —जोकि सुभाष की आखेरी मौत होगी । …बाकी तो इन्सल्लाह की मर्जी से ही होनी है ।
जनम या मौत नाम की घटना वास्तविक या भौतिक संघटन होते हुए भी यह पूर्णत: आधिभौतिक व परावास्ताविक तत्व द्वारा ही सतत-नियंत्रित रहते हैं । …इस दुनिया में जिसे हम वास्तव बोल कर मान लेते हैं, वह तो स्वयं ही कोई ठोस वास्तव नहीं होते !, —बल्कि सिर्फ आधिभौतिक, परावास्ताबिक व अधिवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के प्रतिफलन, प्रतिविम्वन, प्रतिसरण, विच्चुरण, बिकिरण, विच्युतन …आदि से परिवर्तित एक मानवीय धृतिविभ्रम या दृष्टिभ्रम -मात्र ही होते हैं ।

…चलो तो हम फिर हम चलतें हैं, …आगे की और; —अगले पोस्टों की ओर ।
तबतक के लिए *जयतु नेताजी! *जय हिंद!!
[Now, we are to extend our discussion in the next few posts for about pre-mentioned fourteen deaths of Netaji. As well as the next sixteenth death of Netaji will be clarified — this would be the final death of Subhasji. The rest will to be under the desires of Insallah.
His incidences termed as birth or death —though are known to occur as some real and appeared facts, —still they are ever-controlled by the metaphysical and Para-psychological aspects and factors. …Whatever do we assume as some reality, that it is not really real solid fact!! —rather those are just only some reflections, refraction, dispersion, deviations, sparks or reproductions of that really real’s, —which are the Metaphysical, Para psychological, Supra-scientific processes of the cosmos being appeared to us as a part of only some humanistic hallucinations and illusions!!

However, let us now proceed ahead —towards the coming posts.
Thus, for the time being … *Jayatu Netaji! … * Jai hind!!!]

Anjan Banda

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